बांकीपुर का संदेश : विखंडन से एकीकरण तक

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क्या यह केवल एक उपचुनाव है या भारतीय राजनीति के नए दौर की दस्तक?

एक विश्लेषण – अरविन्द सिंह बिष्ट

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कभी-कभी लोकतंत्र एक सीट के माध्यम से पूरे राजनीतिक परिदृश्य को आईना दिखा देता है। बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव का जनादेश ऐसा ही एक आईना है।

लोकतंत्र का एक अनलिखा नियम है—जनता कुछ समय तक किसी भी राजनीतिक दल के दावों पर विश्वास कर सकती है, लेकिन हमेशा के लिए नहीं। सत्ता की सबसे बड़ी भूल तब शुरू होती है जब वह जनादेश को स्थायी जनविश्वास समझ बैठती है। इतिहास गवाह है कि किसी भी लोकतंत्र में राजनीतिक पतन विपक्ष की ताकत से कम और सत्ता के आत्मसंतोष से अधिक शुरू होता है।

बांकीपुर के परिणाम को इसी दृष्टि से पढ़ा जाना चाहिए।
पहली नज़र में यह प्रशांत किशोर की जीत है। लेकिन थोड़ी गहराई में जाएँ तो यह उससे कहीं अधिक है। यह उस धारणा का टूटना है कि प्रशांत किशोर केवल दूसरों को चुनाव जिताने वाले रणनीतिकार हैं। उनकी जन सुराज पार्टी के लिए यह केवल पहली बड़ी जीत नहीं, बल्कि राजनीतिक वैधता का पहला सशक्त प्रमाण है।

लेकिन इस चुनाव की सबसे बड़ी कहानी प्रशांत किशोर की जीत नहीं, बल्कि भाजपा की हार है।
बांकीपुर तीन दशक से अधिक समय तक भाजपा का अभेद्य गढ़ माना जाता रहा। यह केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं था, बल्कि बिहार में भाजपा की शहरी राजनीतिक ताकत का प्रतीक था। यहाँ कायस्थ मतदाताओं की उल्लेखनीय उपस्थिति के साथ-साथ व्यापारी वर्ग, शहरी मध्यवर्ग और भाजपा के पारंपरिक सवर्ण मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। इसलिए इस सीट पर पराजय का महत्व केवल चुनावी नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है।

राजनीति का सबसे बड़ा शत्रु विपक्ष नहीं, आत्मसंतोष होता है।
लगातार चुनाव जीतने के बाद हर दल के भीतर एक भ्रम जन्म लेता है कि जनता के पास उसके अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है। यहीं से शासन पीछे छूटने लगता है और चुनावी राजनीति आगे निकल जाती है। सरकारें जनता के बीच कम और चुनावी रणनीतिकारों के बीच अधिक रहने लगती हैं। प्रशासन की जगह प्रचार लेने लगता है। विकास की जगह राजनीतिक संदेशों का शोर बढ़ जाता है।

भारतीय जनता पार्टी ने पिछले एक दशक में भारतीय चुनावी राजनीति को नए सिरे से परिभाषित किया। संगठन, नेतृत्व, संसाधन और चुनावी प्रबंधन की दृष्टि से उसने अपने प्रतिद्वंद्वियों से लंबी बढ़त बनाई। लेकिन इतिहास का नियम है कि हर शक्ति अपने भीतर अपनी कमजोरी भी पैदा करती है।

मुझे लगता है कि भाजपा आज उसी मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है।
मेरे विचार में राजनीति का पूरा विज्ञान दो शब्दों में समाया हुआ है—विखंडन और एकीकरण।
जब समाज, विपक्ष और जनमत बिखरे रहते हैं, तब सत्ता मजबूत होती है। लेकिन जैसे ही समाज के भीतर एक साझा भावना जन्म लेने लगती है—चाहे वह असंतोष हो, उपेक्षा का अनुभव हो या परिवर्तन की आकांक्षा—तब एकीकरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
यह एकीकरण पहले मन में होता है, बाद में मतपेटी तक पहुँचता है।

पिछले वर्षों में भाजपा को विपक्ष के विखंडन का लाभ मिला। अब यदि मतदाता धीरे-धीरे किसी नए विकल्प की संभावना को स्वीकार करने लगते हैं, तो यह राजनीतिक एकीकरण की शुरुआत हो सकती है। प्रशांत किशोर की वर्षों लंबी पदयात्रा और गाँव-गाँव जाकर लोगों से संवाद स्थापित करने की कोशिश ने शायद इसी संभावना को जन्म दिया। यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि बिहार की राजनीति बदल गई है, लेकिन यह कहना भी उतना ही कठिन होगा कि कुछ बदला ही नहीं है।

लोकतंत्र में परिवर्तन पहले आँकड़ों में नहीं, मनोविज्ञान में दिखाई देता है।
यही कारण है कि मैं बांकीपुर को केवल एक उपचुनाव नहीं मानता। यह एक संकेत है। यह एक चेतावनी है। और शायद एक संभावना भी।
भाजपा के लिए यह संदेश स्पष्ट है कि बहुमत स्थायी संपत्ति नहीं होता। वह जनता द्वारा समय-समय पर नवीनीकृत किया जाने वाला विश्वास है। यदि उस विश्वास का उत्तर सुशासन, संवेदनशीलता और जवाबदेही से नहीं दिया जाता, तो सबसे मजबूत राजनीतिक किले भी भीतर से खोखले होने लगते हैं।

इतिहास हमें बार-बार यही सिखाता है कि सत्ता इसलिए नहीं हारती कि विपक्ष अचानक बहुत शक्तिशाली हो जाता है। सत्ता इसलिए हारती है क्योंकि वह जनता की धड़कनों को सुनना बंद कर देती है।

भारतीय राजनीति का इतिहास भी यही कहता है। आज़ादी के बाद कांग्रेस को कभी अपराजेय माना जाता था। 1977 में जनता ने उसे सत्ता से बाहर कर दिया। बाद में वही कांग्रेस लौटी, फिर गिरी। आज भाजपा राष्ट्रीय राजनीति की सबसे बड़ी शक्ति है। लेकिन लोकतंत्र का नियम किसी दल के लिए अलग नहीं होता। जनता किसी को स्थायी शासन का अधिकार नहीं देती; वह केवल समय-समय पर जिम्मेदारी सौंपती है।
इसलिए बांकीपुर का संदेश केवल बिहार तक सीमित नहीं है। यह हर राजनीतिक दल के

लिए है। चुनाव जीतना राजनीति की सफलता हो सकता है, लेकिन जनता का विश्वास बनाए रखना ही लोकतंत्र की असली परीक्षा है।
लोकतंत्र में जनता कभी पराजित नहीं होती। वह केवल प्रतीक्षा करती है—सही समय की, सही विकल्प की और सही अवसर की। और जब वह निर्णय करती है, तो वर्षों से अभेद्य समझे जाने वाले राजनीतिक दुर्ग भी भरभराकर गिर जाते हैं।
अंततः राजनीति का अंतिम निर्णायक न सत्ता होती है, न संगठन, न धन और न ही चुनावी रणनीति।
अंतिम निर्णायक हमेशा जनता होती है।
इसीलिए इतिहास का यह शाश्वत सत्य कभी नहीं बदलता—
“लोग इतिहास रचने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन कोई भी राजनीतिक दल इतिहास के निर्णय से बच नहीं सकता।”
और शायद बांकीपुर का जनादेश हमें एक और बात याद दिलाता है—
चुनाव सरकारें बना सकते हैं, लेकिन उन्हें टिकाए केवल सुशासन, विनम्रता और जनता का विश्वास ही रख सकता है।

लेखक अरविंद बिष्ट वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह लखनऊ में ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में राजनीतिक संपादक के रूप में सेवाएं दे चुके हैं। विश्व बैंक के नेशनल रिवर बेसिन प्रोजेक्ट में सलाहकार और उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्य सूचना आयुक्त भी रहे हैं।

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