स्मृति शेष –  आसान नहीं होता बल्लभ डोभाल बनना

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यादों के झरोखे से – दिनेश शास्त्री की कलम से

कथाकार, साहित्यकार और उपन्यासकार के रूप में हिन्दी की दीर्घकालीन साधना के बाद बल्लभ डोभाल रूपी नक्षत्र अंतरिक्ष की आकाशगंगा में विलीन हो गया लेकिन उनकी यायावरी और उच्च कोटि का लेखन एक थाती बन कर पीढ़ियों को उनके योगदान का स्मरण दिलाता रहेगा।
30 मार्च 1930 में उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में जन्मे बल्लभ डोभाल बेहद सरल व सहज जीवन शैली के पर्याय रहे हैं। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने अपने गाँव से प्राप्त की और बाद में आगे की शिक्षा के लिए लाहौर (वर्तमान पाकिस्तान) चले गए। उस समय शिक्षा के दो ही केंद्र थे, या तो इलाहाबाद का रुख करें, या लाहौर का। लेकिन यह उनके लिए सुखद नहीं रहा। वे मात्र सत्रह वसंत ही पूर्ण कर पाए थे कि 1947 में भारत का विभाजन हो गया और दंगों के आग में झुलसते हुए किसी तरह बचते बचाते भारत लौटे आए।
शुरुआत में दिल्ली और काफी समय बाद दिल्ली से सटे नोएडा को उन्होंने अपना आशियाना बनाया। बल्लभ डोभाल को करीब से जानने वाले बताते हैं कि उन्होंने अपनी साहित्यिक यात्रा की शुरुआत कविता से की, लेकिन बाद में वे कथाकार और उपन्यासकार के रूप में स्थापित हुए। कवि के रूप में वे कम चर्चित हुए। बल्लभ जी हिन्दी साहित्य के कोष में चार दर्जन के करीब उपन्यास, कहानियाँ, बाल साहित्य, नाटक और यात्रा संस्मरण का योगदान दे गए हैं।
भारत की स्वाधीनता के विषय पर आधारित उनका उपन्यास “कोलज” उस समय बहुत चर्चित हुआ था। उसके बाद उनकी रचना आई आधी रात का सफर। यह भी अपने आप में अत्यंत चर्चित रचना थी। श्राद्ध की दक्षिणा तो साहित्य जगत की पूंजी ही है।
कथा संग्रह का दौर चला तो बल्लभ जी की दस प्रतिनिधि कहानी ने एक अलग मुकाम बनाया। बल्लभ जी की कहानियों में पर्वतीय अंचल से लेकर मैदानों क्षेत्रों तक के जीवन संघर्षों, वृद्ध जीवन की मार्मिक अभिव्यक्ति और मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण मिलता है। एक तरह से उनके हृदय में हिमालय जीवन पर्यंत बसा रहा। उत्तराखंड ने बेशक उन्हें कम याद किया या कहें एक तरह से बिसरा सा दिया लेकिन वे अपने हिस्से के हिमालय को हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में हासिल करते रहे।
इसीलिए चारधाम की तरह जैसे गर्मियों में कपाट खुलते हैं और शीतकाल में निचले स्थानों पर पूजा अर्चना होती है, बल्लभ जी भी गर्मियों में धर्मशाला और सर्दियों में नोएडा परिव्राजन सा करते थे। पिछले कुछ वर्षों से वृद्धावस्था के कारण यह क्रम भंग सा हो गया था लेकिन हिमाचल का धर्मशाला उनकी स्मृतियों से कभी ओझल नहीं हुआ।
लेखन के मामले में बल्लभ जी राहुल सांकृत्यायन की परम्परा के थे। यायावरी उनके जीवन का अभिन्न अंग थी और बोलचाल वही बेलौस। देश के श्रेष्ठ पत्र पत्रिकाओं में बल्लभ जी सदैव अपनी उपस्थिति का आभास दिला कर बता देते थे कि “मैं सक्रिय हूं।”
इस शताब्दी के शुरुआती वर्षों में नोएडा में उनका सानिध्य मिलता रहा। ठीक उसी तरह जैसे डॉ. गोविंद चातक जी कहते थे कि मैं आज जो कुछ हूं, वह हिमालय के कारण हूं और मैंने अपने हृदय में हिमालय बसा रखा है। वस्तुत: चातक जी नई पीढ़ी को संदेश देते थे कि हिमालय जैसी धवलता जीवन में बनाए रखें। ठीक उसी तरह बल्लभ जी भी हिमालय की तरह धवलता धारण किए रहे और इसी कारण जब तब हिमालय उन्हें धर्मशाला बुलाता रहता था।              
       इस शताब्दी के शुरुआती वर्षों में मैं एक साप्ताहिक के संपादन में संलग्न था। मेरे वरिष्ठ नवोदित जी ने सुझाव दिया कि रूटीन की खबरों के विश्लेषण से हट कर कुछ नए प्रयोग करो। नए लेखकों से लिखवाओ, उन्हें उचित पारिश्रमिक प्रदान किया जाएगा। इस निर्देश का पालन करने के लिए मैंने उन्हें साथ लिया और दिल्ली एनसीआर में रह रहे अपने क्षेत्र के स्वनामधन्य रचनाकारों से संपर्क जोड़ा। प्रति सप्ताह उन्हें विषय बताने का सिलसिला हर शुक्रवार को किया जाता और अगले सप्ताह की रूपरेखा एक ही दिन में तय कर ली जाती थी। बल्लभ जी का लेखन निसंदेह उच्च कोटि का था। वे महज लेखक ही नहीं थे बल्कि चिंतक और दार्शनिक भी थे। मुझे स्मरण आ रहा कि उनके एक आलेख में उन्होंने स्थापना दी कि कैलाश कोई भगवान शिव का निवास नहीं बल्कि उस कालखंड का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय था और अलग अलग युगों में वहां से अनेक स्नातक विद्वान बने। बल्लभ जी के इस आलेख पर उनसे लंबी चर्चा हुई।
उन्होंने कहा कि त्रेता में रावण और द्वापर में बाणासुर कैलाश के सर्वश्रेष्ठ स्नातक थे। उनके तर्क अकाट्य होते थे ठीक उसी तरह जिस तरह हिमालय अविचल खड़ा है। बल्लभ जी भी अपनी स्थापना पर दृढ़ता से खड़े रहते थे। आज वे हमारे बीच नहीं रहे लेकिन उनकी स्मृतियां, उनका योगदान और चिंतन सदैव हिमालय से स्नेह रखने वालों की यादों में रहेगा। उत्तराखंड सरकार चाहे तो उनकी स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए कोई उपक्रम कर सकती है लेकिन यह अपेक्षा तो मौजूदा दौर में रेगिस्तान में पानी ढूंढने की मृग मरीचिका ही है। बहरहाल उस कालजयी लेखक और चिंतक की आत्मा को ईश्वर अपने श्री चरणों में स्थान से। शत शत नमन।

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प्रमुख कृतियां- अलकनंदा,पर्वत की छाया में, लौटते पंछी,काफल पक गए। और अन्य अनेक मार्मिक कहानियां एवं लेख।

जन्म- 1933, उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश)

निधन-29 अगस्त 2026 (नोएडा, यूपी)

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